कुछ शिकवे जिंदगी के साथ चलते रहे
सुनने वाले मिले नहीं, सुनाने की चाहत हुई नहीं
सीने में दफन करने का हुनर हमने भी सीख लिया अल्फाजों में शहद घोलने का नुस्खा बना लिया ।
सिस्कियों पर रुकने वाले कदम ठहाके तलाश रहे हैं
अपने हीं लोगों के बीच अपनापन तलाश रहे है
अस्तीन के साँपों को पहचान नहीं पा रहे हैं
झूठों की बस्ती में सच्चा इन्सान तलाश रहे हैं।
मुलाकातों का दौड़ भी बड़ा हसीन हुआ करता था
एक झलक पाने के लिए कितनी तरकीब करता था
अब तो दीदार होने पर भी किस्से अधूरे रह जाते हैं
गूजरे पलों को समेटने की कोशिश भी नाकाम रहते हैं।
समंदर की लहरों को मुट्ठी में समेटना अभी बांकी है
आंधी के बवंडर को बाजुओं से रोकना अभी बांकी है
आसमान की ऊँचाइयों को अभी कदमों से नापना है
वक्त आने दो इतिहास में अपने आप को लिखना है।
लबों से इज्हार ऐ इश्क का अल्फाज सुनना बांकी है
उसके इंतजार का इम्तिहान देना बांकी है
नूर ऐ मुहब्बत का दीदार करना बांकी है
गुलिस्तां ऐ इश्क में अभी फना होना बांकी है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X