दुनियां में कब रुका है कोई किसी के लिये
जो चला गया वो लोट कर कहाँ आया,
हर कोई रोता है दूसरों की बातों पर
मुझे तो अपनी ही बात पर रोना आया।
तकलीफ की कुछ इन्तेहाँ तो होती होगी
हमपे तो सदियों से है ज़ुल्म, होता आया,
अब और किससे उम्मीदें वफ़ा करें हम
जिसको भी मरहम दिया, उसी ने दिल जलाया।
कौन जीया है यहां हमेशा के लिए,
कब किसी की मौत को कोई रोक पाया,
जिस रास्ते से जाने की थी मनाही हमें
उसी रास्ते पर हमने अपना घर बनाया।
जिंदगी की आख़िरी सीढ़ी बची है पर
अब तलक देता है साथ तेरा साया,
तुम तो जाने कहां खो गये अभाज्य
उनको देखो कैसा है उन्होंने मयार पाया।
- प्रवीन चौधरी
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