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मफ़हूम-ए-दोस्ती

                
                                                         
                            तुझसे दोस्ती पर है हमें एतबार,
                                                                 
                            
और नहीं है इल्म हमें,
कि न मिला तेरा हमें प्यार।

ग़ुरूर-ए-दोस्ताना है हमें इस क़दर,
रसूल-ए-प्यार के सफ़र में,
छूटे न साथ तेरा हमसे,
यारानी-ओ-जिंदगानी के सफ़र में।

ताल्लुक़ का बस इतना सा मफ़हूम रहे,
तेरा साथ ता-उम्र गर्दिश में भी क़ायम रहे।

मंज़िल-ए-मुक़ाम मिले न मिले हमें,
तेरा राहगुज़र होना ही ज़िंदगी बना रहे।

 
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2 महीने पहले

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