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अकेलेपन की परछाई

                
                                                         
                            यह वक्त कुछ और है,
                                                                 
                            
यह मंजर कुछ और है।
मैं हूं क्यों इस जमाने में?
यह दौर ही कुछ और है।

कह ना सका बातो को ,
समझ ना सका कोई जज्बातो को।
मिला ना कोई मुझको ,
जो जान जाता हमारे एहसासों को।

दूरियां भी बर्दाश्त होती,
मिलन की फिर वह बात होती।
तो होती यें आम रात भी ,
कुछ खास रात होती।

लो गुजर रहा है दिन हमारा भी,
उल जुलूल के कामों में।
बिसर रहा है जिंदगानी का सफ़र भी,
भोर मिलन का शाम के जज्बातों में।

फ़रामोशी की चाहत में,
'फ़र्जहिंद' सबको बिसर गया।
करना था जिसे बिसर,
उसी को फ़ुआद बिठा गया।
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2 घंटे पहले

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