आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नूतन राव की कुण्डलियाँ_नियति का खेल

                
                                                         
                            सुख में भी सुमिरन किया, दुख भी सहे हजार।
                                                                 
                            
खेला है ये नियति का, क्यों भरतम बेकार।।
क्यों भरतम बेकार, राम थे सब को प्यारे।
चौदह वर्ष गुजारे, बिपिन में मारे मारे।।
कहते नूतन राव, बात नहि रखते मुख में ।
चुनिये सांची राह, कटे दिन दुख या सुख में।।
-सत्येन्द्र पटेल "नूतन राव"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 सप्ताह पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर