सुख में भी सुमिरन किया, दुख भी सहे हजार।
खेला है ये नियति का, क्यों भरतम बेकार।।
क्यों भरतम बेकार, राम थे सब को प्यारे।
चौदह वर्ष गुजारे, बिपिन में मारे मारे।।
कहते नूतन राव, बात नहि रखते मुख में ।
चुनिये सांची राह, कटे दिन दुख या सुख में।।
-सत्येन्द्र पटेल "नूतन राव"
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