टूट जाते हैं, मगर जगह नहीं छोड़ते,
बरगद तूफ़ानों में भी, जड़ें नहीं छोड़ते।
आसान नहीं अंधेरे को मिटा देना,
दिन के उजाले में भी अंधेरे, कौने नहीं छोड़ते।
साया गहराया है सत्ता के ऊपर, पाप का,
शैतान मर जाते हैं मगर, शैतानी नहीं छोड़ते।
जो आया है, उसे जाना भी होगा वक़्त पर,
ज़िस्म राख होते हैं, मगर रूह जीना नहीं छोड़ते।
झूठ की फ़ितरत है, सच को झूठ कर देना,
चोर को लगता है उसके कदम, निशान नहीं छोड़ते।
तृष्णा और लालच का स्वाद ही ऐसा है, प्यारे!
चींटे टूटकर मर जाते हैं, मगर गुड़ नहीं छोड़ते।
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