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अब हर आँख का सपना बड़ा होना चाहता है।

                
                                                         
                            दुनिया ठुकरा दी वफ़ा में उसके,
                                                                 
                            
राम! सीता की अग्नि परीक्षा चाहता है।
लालच-तृष्णा का खेल है निराला,
बरगद का बीज सारी ज़मीन चाहता है।
आसान कहाँ है प्यार को पाना,
परवाना प्यार में जलने, आग चाहता है।
हर शाम उसकी मेरी बाहों में गुजरी,
शादी के लिए वो सती सावित्री चाहता है।
खून से रंगे हैं दोनों हाथ उसके,
मंच पर आकर वो महान होना चाहता है।
मुझे मेरे हाल पर छोड़ो मेरे अपनों,
खून भी, लाल से सफेद होना चाहता है।
सोशल मीडिया की हवा ऐसी चली है,
हर कोई बा-अदब, बेशर्म होना चाहता है।
सत्ता ने फेंकीं हैं बोटियाँ इतनी सारी,
हर एक जमीर गोदी मीडिया होना चाहता है।
किस-किस की चौखट पर इंकलाब करोगे,
हर एक झंडाबरदार अंधभक्त होना चाहता है।
न्याय का तराजू पकड़ा है जिसने,
वही शख्स अब जीभ पर शहद चाहता है।
शागिर्द मुझसे मेरा हुनर चाहता है,
चिता की राख से वो ज़िंदगी चाहता है।
अब कहाँ ढूंढूंगा मैं, गाँव अपना,
अब हर एक गाँव, शहर होना चाहता है।
मासूमियत चेहरों पर दिखती नहीं,
अब हर एक चेहरा, सयाना होना चाहता है।
बच्चों का बचपन खो सा गया है,
अब हर आँख का सपना बड़ा होना चाहता है।
 
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4 घंटे पहले

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