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ओ दर्पण, औरत का इंतज़ार,श्रृंगार और उल्लास तू क्या जाने.

                
                                                         
                            ओ दर्पण, देख कागा शोर मचाये,
                                                                 
                            
पिया आएंगे,पिया आएंगे परदेस से,
ना छेड़ तू मुझे, अब करने दे श्रृंगार,
मेरा श्रृंगार ही तो ,पूर्ण प्रेमसमर्पण है.

ओ दर्पण,एक स्त्री की भीतर की चाहत,
उसका सजना-संवरना,सोलह श्रृंगार,
सिन्दूर-बिंदी, काजल, चूड़ियाँ और पायल,
उसके परंपरागत आभूषण में नज़र आती हैं,
मेरे श्रृंगार,गजरे की महक में प्रेम-समर्पण है.

ओ दर्पण,ये श्रृंगार है प्रेम की अभिव्यक्ति,
पिया के प्रति स्नेह दिखाने का है तरीका,
ये खुशी का है एक एहसास,
ये श्रृंगार पिया की वापसी की है उम्मीद,
पिया मिलन की तन-मन में उठती हैं हिलोरें,
औरत का इंतज़ार,श्रृंगार और उल्लास तू क्या जाने.
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2 hours ago

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