मर्द कभी कमजोर नहीं होता
मर्द कमजोर नहीं होता,
बस दर्द को मुस्कानों में छिपा लेता है।
अपने टूटे हुए सपनों को भी,
परिवार की खुशियों पर लुटा देता है।
सुबह से लेकर रात तलक,
जिम्मेदारियों का बोझ उठाता है।
अपने हिस्से की धूप सहकर,
सबके जीवन में साया बन जाता है।
आँसू उसकी आँखों में भी आते हैं,
पर उन्हें बहने नहीं देता।
दिल हजार बार बिखरता है,
फिर भी किसी को एहसास नहीं होने देता।
माँ-बाप का सहारा बनता है,
बच्चों की उम्मीद कहलाता है।
पत्नी की मुस्कान के खातिर,
अपने हर शौक को भूल जाता है।
समाज कह देता है— "मर्द बनो",
इसलिए वह हर दर्द सह जाता है।
लेकिन सच तो यह है कि
वह भी इंसान है, पत्थर नहीं कहलाता है।
हजार परेशानियों से लड़कर भी,
हर सुबह फिर मुस्कुराता है।
अपनों की खातिर हर तूफ़ान से,
सीना तानकर टकराता है।
सलाम है ऐसे हर मर्द को,
जो खामोशी से जीवन जीता है।
अपने आँसुओं को पीकर भी,
दूसरों के लिए खुशियाँ सीता है।
और अंत में बस इतना कहना है—
जो दुनिया को हिम्मत देना जानता है,
वही सच्चा मर्द कहलाता है,
वह कभी कमजोर नहीं होता।
- प्रशान्त रस्तोगी
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