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कभी कभार अपना ही दम घोंट देने में क्या है

                
                                                         
                            उन्होंने कहा,
                                                                 
                            
जलील हो जाने में क्या है,
काम बनता हो,तो कुछ वक्त को,
लाज लुट जाने में क्या है।
जलेगा जो खून,
झुलस जाएगा जो तेरा बदन,
तो कुछ रंग रोगन कर लेना,
फटे कलेजे पर किमती लिबास कर लेना,
अपनी इज्जत,अपना रुतबा बनाने को,
कुछ पैसा खर्च कर देने में क्या है।

ठीक है,
आज़ाद खयाल ओ रुतबे वाले झूठ नहीं कहते,
लेकिन बस आजादी से तो सब काम नहीं बनते,
सच की राह पर सब गंवा देने में क्या है,
और भी हैं सुख के मायने,
कभी कभार अपना ही दम घोंट देने में क्या है।।
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2 महीने पहले

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