रात के दावे जहाँ पुरजोर होते हों,
पर सबेरा हो तो कोई बात हो।
विपरीत धारा के कोई चलने को कब बोला,
पर पार कोई हो तो कोई बात हो।
राह ज़ाहिर पर गुज़रने में भी कोई बात है,
दुश्वारियाँ अनजान हों तो कोई बात हो।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X