भारत का सरकार हूं मैं ...
देश का सिर ताज हूं मैं .....
मणिपुर मेरा जल रहा ...
चुप बैठा !! गुमनाम हूं मैं
मंद – मंद मुस्काता मैं ...
कुछ नही बोल पाता मैं ..
कितने ढोल बजाओगे तुम
नफरत का हीं आय हूं मैं
कुंभकर्णी निंद्रा का पर्याय हूं मैं ...
हिंसा कराना हीं मंशा है..
तभी तो अधिकांश प्रांत जल रहा है ।।
जितने मेहनत से तूने दिलाई थी आजादी...
सब भूल जाता मैं...
कुछ न याद रख पाता मैं
जब – जब जनता ने बोली है ...
राजसिंहासन डोली है ....
फिर भी कुछ न कर पाता मैं....
विकट परिस्थिति में भी, तानाशाह बन जाता मैं ...
✍🏻 आपका प्रशांत
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