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चारों युगों में कलयुग न्यारा,

                
                                                         
                            चारों युगों में कलयुग न्यारा,
                                                                 
                            
दिखावे का है खेल यह सारा।
सच्चाई को मिला यहाँ वनवास,
झूठ का चमके यहाँ सितारा॥

शब्दों का न कोई धनी,
सब अपशब्दों के ज्ञानी।
दुराचार का ज्ञान धरा पर,
बहती सबकी उल्टी धारा॥

चारों युगों में कलयुग न्यारा,
दिखावे का है खेल यह सारा।
सच्चाई को मिला यहाँ वनवास,
झूठ का चमके यहाँ सितारा॥

समझ-विवेक मौन हैं यहाँ,
उपहास बना जीवन का ध्येय।
कुंठा में सब खोजें आनंद,
श्रेष्ठ विचार यहाँ हुए अज्ञेय॥

विचार-विमुख हुआ युगतल,
छल-कपट हुए प्रबल।
बोधि वृक्ष ना अब मिलता।
मिलता कुविचारों की मधुशाला।

चारों युगों में कलयुग न्यारा,
दिखावे का है खेल यह सारा।
सच्चाई को मिला यहाँ वनवास,
झूठ का चमके यहाँ सितारा॥
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एक घंटा पहले

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