वाह रे रोटी तेरी भी अजब महिमा है।
कोई कमाने को दौड़ता है।
कोई पचाने को दौड़ता है।
कोई देखने भर को तरसता है।
कोई इसे बनाकर इसे बेचकर
उन पैसे से तुझे ही खरीदता है।
कोई अपनों से ही छिपाता है।
कोई अपना निवाला छोड़कर
दूसरे को देता है।
कोई किसी के हक की छीनता है।
कोई किसी को दो रोटी तक नहीं
दे सकता है।
कोई बासी खाता है ना मिले तो
दर दर की ठोकरें खाता है।
कोई छीनकर खाता तो कोई
बांटकर खाता है।
घरेलू झगड़ों में सबसे पहले तुझ
पर ही वार होता है।
तुझे पानें के लिए दो भाईयों
में बंटवारा होता है।
बुजुर्ग माता-पिता को हाथ जोड़कर
मांगना पड़ता है।
अपने ही बच्चों से दो वक्त की रोटी
के लिए ना जाने क्या क्या समझौता
करना पड़ता है।
अगर वो भी ना मिले तो वृद्धाश्रम
में जीवन जीना पड़ता है।
गरीब किसान को तपती धूप में रहना
पड़ता है। बैल को भी भार ढोना पडता है।
दो वक्त की रोटी के लिए जाने कितनों
को दिन रात एक करना पड़ता है।
दो वक्त की रोटी के लिए खुद को
खोना पड़ता है। बहुत कुछ सुनना पड़ता है।
अकेले चुपचाप रोना पड़ता है।
धूप बरसात में भी भागकर तेरे लिए
खुद को खोना पड़ता है।
आसानी से नहीं मिलती है तेरे लिए
क्या क्या करना पड़ता है। जिनको मिली
है वो कहां शुक्रिया करते हैं।
तुझे कमाने के लिए पापड़ बेलने पड़ते हैं।
एक बात जो मुझे भी समझ आई है
रह लेना भूखें पी लेना पानी पर कभी
उस व्यक्ति के हाथ की रोटी मत खाना
जो आपसे नफ़रत करता है।
नफ़रत की रोटी जहर समान है एहसान
की रोटी रोग बढ़ाती है।
खा लेना ठंडी सूखी पर कभी मत खाना
उस हाथ की रोटी जो आपसे जलते हैं
नफ़रत करते हैं।
हे रोटी तेरी महिमा अपरंपार है।
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