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कभी कभी कुछ अजीब सा लगता है

                
                                                         
                            कभी कभी जब देखूं मुड़कर पीछे
                                                                 
                            
धड़कन तेज हो जाती हैं
रात के गहरे सन्नाटे में
नींद खुल जाती है।

अतीत के वो गहरे जख्म
दिल में खलबली मचाते हैं।
खींचते हैं वो ज़ख्म मुझे अपनी
ओर बुलाते हैं।

भूत भविष्य वर्तमान से लड़ते हुए
ये कहां पहुंच गये
चारों ओर खाली है
सन्नाटा है

आगे देखूं तो कूआं है
पीछे देखूं तो खाई है।

कुछ ना बोल पाने की असमर्थता है।
जैसे किसी ने रोका है मुंह को सिल
लिया है।

मौन रहकर बस देखें जा रहे हैं
अपने तमाशे में ताली बजा रहे हैं।

सन्नाटे और अंधेरे से मुलाकात होती है।
बस एक परछाई ही मेरे साथ होती है।
चिंताओं और अफसोस से मित्रता हो गयी है।
खुशीयां बिस्तर लगाकर गहरी नींद में सो गयी हैं।

दुख के बादल छाए रहते हैं।
तस्वीरे हैं दीवारें हैं अलमारी हैं।
भीड़ भी है पर अपनी नहीं।
क्या हो गया
सब कहां खो गया।

पीठ पर आस्तीन के सांप हाथ
थपथपाते हैं। अब तो दादर ही
चिल्लाते हैं।

सुनने वाले कहां रहे मन की बात कहो
तो खबरें फैलाते।

चुपचाप भीतर ही भीतर सब जमा
कर लिया है। अर्धरात्रि को विचार
जगाते हैं और उठकर कलम चलाते हैं।
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3 महीने पहले

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