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मित्रों की मधुशाला

                
                                                         
                            मित्रों के संग बहुत दिनों के
                                                                 
                            
बाद पीऊंगा मै हाला
पहले जी भर दूंगा गाली
फिर टकराएगा प्याला
इक पर इक सब पीने वाले
सागर कम पर जाएगा
जब तरंग छाएगा सब पर
रच देंगे इक ' मधुशाला'।

कान्हा होगा वृन्दावन मे
मै तो कहता हूं लाला
अफसर होगा बहुत बड़ा पर
साकी बन भरता प्याला
झट जाए वो सुट्टा लाने
झट सुलगाएगा ज्वाला
हाकिम और अमले का ऐसे
फर्क मिटाती मधुशाला।

सबकी अपनी अदा निराली
सबकी अपनी है हाला
सबके अपने ठाठ बड़े हैं
सबका अपना है प्याला
दो घूंट पी कोई बस कहता है
कोई घट-घट पीने वाला
जिसकी जितनी प्यास बड़ी है
उसको मिलती उतनी मधुशाला।

कोई बहक कर संजीदा हो
राज सुनाएगा गहरे
कोई नशे मे उन्मत्त होकर
मुझे बुलाएगा साला
देख के इन मतवालों को
ना विस्मृत हो जाएं कहीं
इक युग पर खुलकर जीते हैं
इनसे जी जाती है मधुशाला।

दो पग जीवन पथ चलकर
है खो डाला हमने प्याला
इक मंजिल पाने को बस
है भुला दिया हमने हाला
अपना बस इक नाम बनाने को
क्या हमने यह कर डाला
जीवन की कीमत मे हम
खो बैठे अपनी मधुशाला।

प्रकाश रंजन 'शैल'
मो 7762041111

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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