सैनिक था जाँबाज वो,भारत का था वीर।
था वह सौरभ कालिया,मन पर उजला क्षीर।।
गश्त लगाती टुकड़ियाँ,सेना की थी अल्प।
घात पाक ने कर दिया,था कोई न विकल्प।।
फिर भी भागा दल नहीं,टूट पड़ा ले शस्त्र।
छूट गए छक्के त्वरित,थे वे छद्म सहस्त्र।।
राह न सूझी तब किया,कटि के पीछे वार।
वंदि बना के छल किया,अतिशय अत्याचार।।
नैत्र हताहत कर दिए,तन कर डाला छिन्न।
वीर नहीं फिर भी हुआ,स्व के फर्ज से भिन्न।।
कहते सौरभ वीर को ,देख के चश्मदीद।
युद्ध कारगिल में हुआ,उत्तम वीर शहीद।।
-प्रज्ञा देवले 'प्रज्ञा'
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