आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दोहे

                
                                                         
                            सैनिक था जाँबाज वो,भारत का था वीर।
                                                                 
                            
था वह सौरभ कालिया,मन पर उजला क्षीर।।

गश्त लगाती टुकड़ियाँ,सेना की थी अल्प।
घात पाक ने कर दिया,था कोई न विकल्प।।

फिर भी भागा दल नहीं,टूट पड़ा ले शस्त्र।
छूट गए छक्के त्वरित,थे वे छद्म सहस्त्र।।

राह न सूझी तब किया,कटि के पीछे वार।
वंदि बना के छल किया,अतिशय अत्याचार।।

नैत्र हताहत कर दिए,तन कर डाला छिन्न।
वीर नहीं फिर भी हुआ,स्व के फर्ज से भिन्न।।

कहते सौरभ वीर को ,देख के चश्मदीद।
युद्ध कारगिल में हुआ,उत्तम वीर शहीद।।

-प्रज्ञा देवले 'प्रज्ञा'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर