नारी को अबला कहने वालों ,
अब जागो रण होने को है।
खुल रही हैं सारी जंजीरें,
और अहम तेरा खोने को है।
अबला के वेश मे इक शक्ति,
तेरा चक ज़िगर होने को है
मत समझो इसको बेचारी,
अब तो जागो हर अत्याचारी
की तेरा स्वांग स्वाह होने को है।
क्या समझा है तू औरत को...
कमजोर, अबला, या बेचारी?
क्या भूल गया उस दिन को तू
पुरुष ने वेश धरा नारी...
कुरुक्षेत्र के युद्ध में भीष्म पर ..
इक नारी ही पड़ती भरी।
मत खेल तू ऐसे खेल अरे! मत खेल
जिसमें अस्मत जाए उतरी,
तू भूल गया शायद वो स्मृति
मोहिनी(नारी) वेश में गिरिधारी
हर दानव को छल गया भारी।
ममता के रूप में मां है वो
प्रेम अपार लिए प्रेमिक है वो
राखी की थाल सजाए हुए
तेरी भी तो बहना है वो
मत दे हवा उस चिंगारी को
गर खुशहाल तुझे रहना है तो
दे इज़्ज़त हर इक नारी को
दे इज़्ज़त हर इक नारी को।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X