आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कृष्ण अर्जुन वार्तालाप

                
                                                         
                            बातें करते हो बड़ी बड़ी पर तुम बोलो क्या कर पाओगे?
                                                                 
                            
सामने खड़े हो दाऊ तुम्हारे बोलो तुम क्या लड़ पाओगे?
हुए क्रोधित फिर माधव रण में किंतु मन को शांत रखा,
समझाने को पार्थ के सम्मुख गीता का सिद्धांत रखा।
अर्जुन ये मत देखो युद्ध में कौन है अपना और पराया,
इस धरती पर कभी भी कोई साथ में कुछ भी ले ना आया।
बात यहां बस अपनो की ही होती तो मैं क्यों आता?
महा समर के इस रण में तुम्हारा सारथी मैं न बना होता।
धर्म अधर्म का युद्ध है ये, इसमें केवल तुम देखो धर्म,
इनके वजह से इनके सम्मुख जो जो हुए थे सोचो अधर्म।
इन अधर्मियों का नाश करना अब हाथ तुम्हारे आया है,
इन पापियों का अंत होना तो विधाता ने विधाया है।
तुम तो केवल एक श्रोत हो अर्जुन इस लीला के पात्र हो,
यह सब तो करता हूं मैं ही, केवल तुम एक कंकड़ मात्र हो।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर