चुनरी मेरी कोई रंग ना ले,
ना जाने किस रंग की चाह है इसे,
हवा में उड़ती है मदमस्त होकर,
मगर ओढ़नी बनकर मुरझा जाती है,
मायूस सी बैठी इंतज़ार किए किसीका,
शायद वो प्रेम जो मुझे कभी था,
मुझसे ज़्यादा इस चुनरी को हुआ है उनसे,
सौगात थी हमारे रिश्ते की,
जो एक दिन बंदिश बन गया,
वो तो चला गया,
मगर ये चुनरी रह गई,
ओढ़नी बनकर उदास सी मुझपर लिपटी हुई,
बस बसंती हवा को महसूस कर लेती है कभी कभी,
मदमस्त होना कौन नहीं चाहता,
ज़ख़्म को भरना कौन नहीं चाहता,
चाहे कितनी बार भी दिल टूटा हो,
फिर से मोहब्बत करना कौन नहीं चाहता |
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
कमेंट
कमेंट X