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प्रकृति का तांडव

                
                                                         
                            ये तो अग्नि की गरिमा है
                                                                 
                            
कि वो भोजन सिर्फ पकाती है
वरना उसकी लपटें तो
सब कुछ भस्म कर जाती हैं।

मंद पवन जब बहती है
हृदय तृप्त कर जाती है
परन्तु जब वो वेग में आती है
सब कुछ उड़ा ले जाती है।

ये नदिया का पानी भी
प्यासे की प्यास बुझाता है
पर जब वो उग्र हो जाता है
सब तिनके की तरह बह जाता है।

ये समुद्र की महिमा है कि उसमें
असंख्य जीव आसरा पाते हैं
वर्ना जब वह रौद्र रूप में आता है
तो हर तरफ विनाश कर जाता है।

बादल फुहार जब बरसाते हैं
तन-मन हर्षित कर जाते हैं
पर जब वो कुपित हो जाते हैं
तो फिर सब जलमग्न कर जाते हैं।

इसलिए रे, हे मानव! तू
प्रकृति संग खिलवाड़ न कर
ग़र प्रकृति क्रुद्ध हो जाती है
तो फिर वो तांडव दिखलाती है।
- प्रदीप त्रिपाठी "दीप"
 
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8 महीने पहले

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