ग़ज़ल
मशवरा है ये हर किसी के लिए
ज़िन्दगी कम है आशिक़ी के लिए
मौत आसाँ नहीं किसी के लिए
सोचता क्यों है ख़ुद-कुशी के लिए
राह दुश्वारियां भरी ही सही
क्या है आसान ज़िदंगी के लिए
कोई दीपक न ले के आएगा
ख़ुद ही जलना है रौशनी के लिए
चार रोटी का मस'अला है बस
ज़हर भी पीते हैं इसी के लिए
सर की दस्तार ही बलंदी है
इज़्ज़त ओ आबरू ख़ुदी के लिए
हम भी पालेंगे इश्क़ का मछली
जल परी है ये मुल्तजी के लिए
'दीप' ख़्वाबों को अब हक़ीक़त कर
वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए
-प्रदीप तिवारी 'दीप'
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