आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए

                
                                                         
                            ग़ज़ल
                                                                 
                            

मशवरा है ये हर किसी के लिए
ज़िन्दगी कम है आशिक़ी के लिए

मौत आसाँ नहीं किसी के लिए
सोचता क्यों है ख़ुद-कुशी के लिए

राह दुश्वारियां भरी ही सही
क्या है आसान ज़िदंगी के लिए

कोई दीपक न ले के आएगा
ख़ुद ही जलना है रौशनी के लिए

चार रोटी का मस'अला है बस
ज़हर भी पीते हैं इसी के लिए

सर की दस्तार ही बलंदी है
इज़्ज़त ओ आबरू ख़ुदी के लिए

हम भी पालेंगे इश्क़ का मछली
जल परी है ये मुल्तजी के लिए

'दीप' ख़्वाबों को अब हक़ीक़त कर
वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए
-प्रदीप तिवारी 'दीप'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर