तुम्हारे दिल को मरहम चाहिए था।
कोई तो नैन पुर-नम चाहिए था।।
कोई सुहबत कोई सुहरत को तरसे ।
हमें बस आपका ग़म चाहिए था।।
झटक के बुत तराशा तोड डाला।
खिलौना तुमको हम-दम चाहिए था।।
दिल ए बर्बाद इस चाक ए ज़िगर को
हसीं माशूक़ बरहम चाहिए था।।
मुहब्बत का जहां मेला हो लगता।
वही चाहत का संगम चाहिए था।।
कोई भजनों में बपतिस्मा में डूबा।
किसी को आब ए ज़मज़म चाहिए था।।
मैं कैसे मान लूं तुमने किया है ।
बलंदी का तो परचम चाहिए था ।।
परिंदा 'दीप' सूरज छू न पाया ।
परो में और दम-ख़म चाहिए था ।।
-प्रदीप तिवारी 'दीप'
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