आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

खिलौना तुमको हम-दम चाहिए था

                
                                                         
                            तुम्हारे दिल को मरहम चाहिए था।
                                                                 
                            
कोई तो नैन पुर-नम चाहिए था।।

कोई सुहबत कोई सुहरत को तरसे ।
हमें बस आपका ग़म चाहिए था।।

झटक के बुत तराशा तोड डाला।
खिलौना तुमको हम-दम चाहिए था।।

दिल ए बर्बाद इस चाक ए ज़िगर को
हसीं माशूक़ बरहम चाहिए था।।

मुहब्बत का जहां मेला हो लगता।
वही चाहत का संगम चाहिए था।।

कोई भजनों में बपतिस्मा में डूबा।
किसी को आब ए ज़मज़म चाहिए था।।

मैं कैसे मान लूं तुमने किया है ।
बलंदी का तो परचम चाहिए था ।।

परिंदा 'दीप' सूरज छू न पाया ।
परो में और दम-ख़म चाहिए था ।।
-प्रदीप तिवारी 'दीप'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर