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झूठ का आवरण

                
                                                         
                            ओढ़ कर तन बदन झूठ का आवरण ।
                                                                 
                            
कह रहे साफ़ है मेरा अंत:करण ।।

मन शिवाले में रघुनाथ का हो भजन ।
तप से निर्मल बनेगा तभी आचरण ।।

मोह से ग्रस्त हो कर मैं जाऊं कहां ।
तन ये पाषाण जोहे तुम्हारे चरण ।।

राम बनने की कोशिश में बहरूपिए ।
कर रहे आज़ खुद ही सिया का हरण ।।

घोर कलयुग में अब आज़ की नारियां ।
छोड़ अर्जुन दुशासन का करती वरण ।।

आधुनिकता के हाथों लुटी संस्कृति ।
करते खलनायकों का सभी अनुसरण ।।

सोच और ये समझ सब हैं गिरवी यहां ।
नोट से पुन्य का होता पंजीकरण।।

'दीप' जलता रहेगा पिया नाम का ।
द्वार पर नाथ के चल रहा आमरण ।।
-प्रदीप तिवारी दीप
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2 महीने पहले

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