फिर इन्कलाब दिखायेगा मेरी आंखों को
सराब में वो डुबायेगा मेरी आंखों को
फलक पे मुझको बिठाने की बात करता है
कोई तो ख़्वाब दिखायेगा मेरी आंखों को
कभी पहाड़ कभी झरने बीच पर कोई
वो वादियों में घुमायेगा मेरी आंखों को
चढ़ा के झूट का चश्मा हसीन आंखों पर
मय ए फरेब पिलायेगा मेरी आंखों को
कोई तिलिस्म भी उसको बचा न पायेगा
गो आइना जो दिखायेगा मेरी आंखों को
कोई तो 'दीप' जलायेगा इन अंधेरों में
कोई तो सच भी बतायेगा मेरी आंखों को
-प्रदीप तिवारी
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