तिल को अब ताड़ बनाने की ज़रूरत क्या है?
झूठ के पेड़ उगाने की ज़रूरत क्या है?
बात कोई हो सलीके से उसे पेश करो।
आग पानी में लगाने की ज़रूरत क्या है?
फल पकेंगे तो गिरेंगे वो ज़मीं पर ख़ुद ही।
शाख को हद से हिलाने की ज़रूरत क्या है?
हम शरीफ़ों की शराफ़त को न झुठलाओ अब।
ज़र ए ख़ुश्बू को मिटाने की ज़रूरत क्या है?
हाथ में हाथ हो काँधें पे हो ये सर तेरा।
फिर कोई ख़्वाब सजाने की ज़रूरत क्या है?
इश्क़ हमसे है तो अब बोल भी दो जानेजाँ।
बात सच है तो छुपाने की ज़रूरत क्या है?
'दीप' जलने दे मुहब्बत का मेरी चौखट पर।
शम् ए उल्फ़त को बुझाने की ज़रूरत क्या है?
-प्रदीप तिवारी 'दीप'
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