आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जीत सका न काल कोई भी अमीर

                
                                                         
                            कोई भी न जाने मानव मन की पीर,
                                                                 
                            
भला कोई कैसे बताए हृदय को चीर,
आवरण से लिपटा हँसमुख चेहरा,
पर!भीतर तो घाव हैं अति गंभीर।।

महाठगिनी है संसारी माया की जंजीर,
खोना-पाना ही समझे जिसे अपनी तकदीर।
जिसने समझा जीवन-मर्म, व्यथा का रहस्य,
वही बन गये बुद्ध गौतम, नानक और कबीर।।

जीत सका न काल कोई भी अमीर,
कुटिया में मस्त जीवन जीते फकीर।
बाजार की भीड़ में उलझा अशांत मन,
पर जीवन का सार—शील, संयम और धीर।।
- प्रदीप सोनसर्वदीपाक्षर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर