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सच मानो यारो

                
                                                         
                            सच मानो यारो यहां, कुछ नहीं रुक पाएगा।
                                                                 
                            
एक दिन तू भी इस काया से, अपने प्राण गंवाएगा।।
कर ले मानव धर्म यहां,तू बेअंत समय जाएगा।
एक दिन तू भी इस काया से, अपने प्राण गंवाएगा।।

क्या तेरा, क्या मेरा - ये बात बड़ी गहराई की।
सच मानो यारो ये बात चतुराई की।।
एक दिन तू भी इस संसार से खाली हाथ रह जाएगा।
एक दिन अपना- तेरा करके यूंही प्राण गंवाएगा।।

बंधन में तुझको बांधा है, क्या इन्हें निभा तू पाएगा?।
एक दिन इन्हीं बंधनों को तू दुःख ही देकर जाएगा।।
फिर क्यों करता है?
मोह माया से कुछ हाथ न तेरे आएगा।
सच मानो यारो, यहां कोई न बचकर जाएगा।।

जीवन की ये रीत यहां, तू गीत यही तू आएगा ।
इधर- उधर की ठोकर खाकर ,
दुःख के ही गीत सुनाएगा।।

इससे अच्छा तू ले नाम प्रभु का, इस भवसागर से तर जाएगा।
अंत समय में तो तेरा, प्रभु से मिलन हो जाएगा।।
कर लो सेवा मात- पिता की , यहां सब तीरथ तर जाएंगे।
भवसागर की तो बात है क्या, स्वयं प्रभु तुझे लेने आएंगे।।

रविदास और कबीरदास ने ये दार्शनिक भाव विचारा है।
अब छोड़ो इस मोह माया को, होने दो उजियारा है।।
इन्हीं भाव में रहकर तू एक दिन सुख के ही दीये जलाएगा।
मान ले प्यारे, तू भी एक दिन इस माया से तर जाएगा।।

इन्हीं भाव को लेकर प्रदीप PK की चिंता जारी है।
कर्म को राह बनाकर देखो, फिर होती विजय हमारी है ।।
-प्रदीप सिंह पीके
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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