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दया, धर्म को पकड़े रखना

                
                                                         
                            प्यार के फूलों को प्यारे, तू इस तरह से बॉट रे।
                                                                 
                            
ये जीवन है, अनमोल प्यारे
इसे हँस खेल कर काट रे।।

क्या तेरा, क्या मेरा,
इन सबके मत को तू छाठ
ये जीवन है, अनमोल प्यारे
इसे हँस खेल कर काट रे।।

प्यार की भाषा को तुम बोलो,
अंतर आत्मा को तुम खोलो,
पेट में न लाना तुम कभी कोई गाँठ रे।
ये जीवन है, अनमोल प्यारे
इसे हँस खेल कर काट रे।।

ना किसी को तुम घात करना,
ऐसो का तुम साथ करना,
जहाँ हो दया, धर्म का पाठ रे।
ये जीवन है ,अनमोल प्यारे
इसे हँस खेल कर काट रे।।

ईमानदारी से तुम रहना,
सबकी बातों को तुम सहना,
जहाँ हो जग का कल्याण,
वहां तुम बढ़ाना सदैव अपना हाथ रे।
ये जीवन है, अनमोल प्यारे
इसे हँस खेल कर काट रे।।

दया, धर्म को पकड़े रखना,
ईमानदारी में तुम लिपड़े रहना,
न बिछाना कभी तुम मतलब की खाट रे।
ये जीवन है, अनमोल प्यारे
इसे हँस खेल कर काट रे
इसे हँस खेल कर काट रे।।
-प्रदीप 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
40 मिनट पहले

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