असीम जी और चश्मा,
जब भी मिलते हैं,
चश्मे का रंग और प्रकार पूछ जाते हैं।
चश्मा तो आँखों को देखने में मदद करता है,
पर वो हमें समान देखने की सीख भी दे जाता है।
काँच से नहीं, नज़रिये से फर्क पड़ता है,
क्योंकि वही चश्मा
किसी को बड़ा, किसी को छोटा बना जाता है।
असीम जी समझाते हैं हँसते-हँसते,
“चश्मा बदलना आसान है,
पर सोच का नंबर बदलना
सबके बस की बात नहीं हो पाता है।”
असीम जी ने मेरा चश्मा
बोल-बोल के बदलवा दिया,
कभी नंबर गलत बताया,
कभी फ्रेम पसंद नहीं आया।
मैं बदलता गया चश्मे,
नज़र सुधारने के नाम पर,
पर हैरानी ये रही कि
असीम जी ने
अपना पुराना चश्मा नहीं बदला।
शायद उनका चश्मा
काँच का नहीं,
आदतों का था,
जो दूसरों की धुंध तो साफ़ देख ले,
पर अपनी धुंध
उन्हें कभी दिखी ही नहीं।
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