कैसे पिरोऊँ तुम्हें शब्दों में?
तुम स्वच्छन्द विचरती अप्सरा।
मैं सामाजिकता में बँधा प्राणी,
मैं व्यवहारिकता का क़लमकार।
तुम प्रेम-ग्रंथों का अनुपम सार,
बस एक कौतूहल है अंतस् में—
पढ़ूँ मैं तुमको बारम्बार।
तुम्हारे पावन स्पंदन को छूकर,
स्याही भी कुछ-कुछ शर्माती है।
इन कोरे पन्नों की छाती पर,
युगों की प्यास उतर जाती है।
तुम मूक गगन की सहचरी ,
मैं वसुधा का विरक्त श्रृंगार।
बस एक कौतूहल है अंतस् में
पढ़ूँ मैं तुमको बारम्बार …….।
अनंत रेखाएँ ये मर्यादाओं की,
अब कब तक मुझको रोकेंगी ?
आश्वस्त करो इन नयनों को,
दूरियाँ भी तब कुछ बोलेंगी।
तुम मुक्त क्षितिज का विस्तार,
प्रिये,
मैं सीमित सा एक आकार।
बस एक कौतूहल है अंतस् में
पढ़ूँ मैं तुमको बारम्बार……..।
जब निशा अकेली होती है,
दीप सिहर कर बुझता है।
हर आह तुम्हारी यादों में,
कोई सुर सुलगता है।
तुम चाँद-सितारों का प्रकाश
मैं मौन रात का अन्धकार।
बस एक कौतूहल है अंतस् में
पढ़ूँ मैं तुमको बारम्बार……।
पर अंतस में जब यह रात ढले,
और भोर नया आकार धरे—
मैं स्याही बन तुझमें घुल जाऊँ,
तू मुझमें अक्षर-अक्षर उतरे।
फिर कौन टोकेगा यहाँ मुझे,
कौन तुम्हें रोकेगा उस पार।
बस एक कौतूहल है अंतस् में,
पढ़ूँ मैं तुमको बारम्बार ……।
— प्रभात कुमार “प्रभात”
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