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आलू का साम्राज्य

                
                                                         
                            आलू तो है सबका राजा,
                                                                 
                            
जो सब के संग करता साझा
यारी करने सब रहते आतुर,
टमाटर लँगोटिया यार कहलाता।
गोभी-गाजर ने भी हँसकर,
इसकी सच्ची प्रीत स्वीकारी।
बैंगन के संग तो आलू की,
लगती है बड़ी पुरानी यारी।
रमास ने भी रमते-रमते,
याराना फिर खूब निभाया।
धीरे-धीरे आलू ने जग में,
अपना साम्राज्य खूब बढ़ाया।

कुछ सब्जियों ने भी बात उठाई,
बोलीं, "हमनेअपनी रंगत खुद बनाई!"
इतने में तमतमाती शिमला मिर्च आई,
आकर उसने यह तान सुनाई—
"मैं क्यों झुकूँ तुम्हारे आगे?
मसालों के संग मैं तो सजती हूँ।
मेरा रुतबा है सबसे आगे,
मैं महफिल में शान से रहती हूँ।
भले ही तुम राजा कहलाओ,
पर मैं अपने मन की राजकुमारी हूँ!"

तभी कमर मटकाकर भिंडी आई,बोली—
"सुन आलू, मैं तुझ पर भारी हूँ!
तुमसे मेरा कोई मेल नहीं है,
तुम आलसी, भद्दी है तुम्हारी मोटाई।
तुम बिन अपनी दुनिया खुद बनाऊँ,
मुझको तेरी यारी रास न आई।
मैं तो थाली की रौनक बन जाऊँ,

और बच्चों के टिफिन सजाऊँ।"
तभी रसोई के शाही कोने से,
पनीर मियाँ भी बाहर आए।
सफेद मखमली कुर्ता पहने,
आलू को अपनी आँखें दिखाए।
बोले पनीर, "अरे ओ आलू!
मत करना मुझसे मेल-मिलाई।
मैं तो केवल मटर, मलाई,
या पालक संग जमता हूँ भाई।

लौकी, तोरई और करेला बोले—
"हमको भी अपनी सेहत प्यारी।
हम सीधे-साधे और सरल-सच्चे,
नहीं चाहिए राजा की चाटुकारी।"
इस तरह राजा की इस सत्ता में,
मुट्ठी भर हरी सब्जियों ने सेंध लगायी ।
आलू का गढ़ डगमगा गया,
जब लोकतंत्र की आँधी आई।
— प्रभात कुमार 'प्रभात'
 
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2 महीने पहले

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