मैं क्यों फँसा मझधार में,
क्यों उलझा हूँ संसार में,
चलना चाहूँ अपनी राहों पर,
क्यों बँधा हुआ हूँ जंजाल में।
सपने मैंने भी देखे थे,
कुछ अपने, कुछ अपनों के,
खुशियों के दीप जलाने को,
अरमान सजे थे आँखों में।
पर वक़्त ने ऐसी चाल चली,
हर राह नई दीवार बनी,
जिसको अपना समझा मैंने,
वही कहानी सवाल बनी।
मैं क्यों फँसा मझधार में,
क्यों डूब रहा हूँ विचार में,
किनारा दिखता है दूर कहीं,
क्यों नाव फँसी पतवार में।
चेहरे पर मुस्कान लिए,
दिल में कितने तूफ़ान लिए,
सबकी ख़ातिर जीता आया,
अपने ही अरमान दबाए।
कुछ रिश्तों का कर्ज़ चुकाना है,
कुछ वादों को निभाना है,
खुद से मिलने की चाहत है,
पर सबको साथ निभाना है।
कभी अपनों की उम्मीदें हैं,
कभी ज़िम्मेदारी के बंधन हैं,
कभी जीत का जुनून जगा है,
कभी हार के भीषण कंपन हैं।
मैं थकता हूँ, पर रुकता नहीं,
टूटता हूँ, पर झुकता नहीं,
आँखों में नमी भले ही हो,
मैं दर्द किसी से कहता नहीं।
मैं क्यों फँसा मझधार में,
क्यों खोया अपने संसार में,
क्या इतनी-सी ख़्वाहिश ग़लत थी,
कि जी लूँ अपने अधिकार में?
अब ख़ुद से एक सवाल करूँ,
कब तक यूँ ही मलाल करूँ?
जो बीत गया, वो बीत गया,
क्यों कल के लिए आज जला करूँ?
माना राह कठिन है मेरी,
माना रात अभी है गहरी,
लेकिन मुझमें हौसला भी है,
और बाकी है उड़ान मेरी।
अब लहरों से टकराऊँगा,
अपनी राह स्वयं बनाऊँगा,
चाहे जितना गहरा हो सागर,
मैं पार उतरकर जाऊँगा।
कल फिर सूरज निकलेगा,
मन का हर कोना चमकेगा,
जो आज खड़ा है मझधार में,
कल उसका भी किनारा होगा।
अब नहीं पूछूँगा ख़ुद से,
मैं क्यों फँसा मझधार में,
अब अपनी क़िस्मत लिखनी है,
हिम्मत की अपनी धार से।
नाव मेरी, पतवार मेरी,
मंज़िल भी अब होगी मेरी,
चाहे वक़्त करे लाख सवाल,
जीत बनेगी पहचान मेरी।
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