छठ मइया का आना
छठ मइया का आना था,
घर-आँगन मुस्काता था,
मिट्टी के उस छोटे घर में,
पूरा संसार समाता था।
याद है आज भी वो बचपन,
वो गलियाँ, वो कच्चे रास्ते,
माँ के पीछे-पीछे चलते,
हम भी चलते हँसते-हँसते।
घर में होती थी साफ़-सफ़ाई,
आँगन में मिट्टी लिपती थी,
माँ जब छठ का नेम निभाती,
हर मुश्किल छोटी लगती थी।
चूल्हे पर ठेकुआ बनता था,
गुड़ की मीठी खुशबू आती थी,
दउरा सजता, सूप सजता,
हर चीज़ में श्रद्धा समाती थी।
नए कपड़ों की ज़िद अपनी थी,
प्रसाद चखने की चाहत थी,
माँ की डाँट में प्यार छिपा था,
और घर में कितनी राहत थी।
वो घाट की रौनक, वो भीड़,
वो गीतों की मीठी तान,
डूबते सूरज को अर्घ्य देते,
हर आँख में दिखता था मान।
जब उगते सूरज की पहली किरण,
जल की लहरों पर आती थी,
छठ मइया के जयकारों से,
धरती भी धन्य हो जाती थी।
माँ के चेहरे पर तेज़ अनोखा,
आँखों में विश्वास अपार,
अपने लिए कुछ माँगा हो या नहीं,
माँगती थी हम सबका सुख-संसार।
मगर वक़्त ने कैसी करवट बदली,
वो बचपन कहीं पीछे छूट गया,
जिस आँगन में खुशियाँ पलती थीं,
वो आँगन यादों में सिमट गया।
अब शहरों की भाग-दौड़ में,
वो फुर्सत कहाँ से लाऊँ मैं,
वो पुराने दिन, वो अपना बचपन,
किस दरवाज़े पर पाऊँ मैं?
आज भी जब छठ का पर्व आता है,
मन बचपन में लौट जाता है,
ठेकुए की खुशबू से पहले,
माँ का चेहरा याद आता है।
वो अपनेपन की छोटी दुनिया,
वो रिश्तों का निष्कपट प्यार,
वो बिना किसी स्वार्थ के मिलना,
वो खुशियों का खुला बाज़ार।
अब समझ आया, माँ के व्रत में,
सिर्फ़ पूजा-पाठ नहीं होता था,
उसके हर निर्जल दिन के पीछे,
हम बच्चों का सुख होता था।
हे छठ मइया! एक अरज़ सुन लेना,
फिर वही दिन लौटा देना,
जिस आँगन में माँ की हँसी गूँजती थी,
उस आँगन से मुझे मिला देना।
फिर से वही सुबह हो जाए,
फिर वही शाम सुहानी हो,
माँ मेरे सिर पर हाथ रखे,
और आँखों में वही कहानी हो।
न धन की चाह, न महलों की ख़्वाहिश,
न दुनिया से कोई शिकायत हो,
बस माँ का साथ, अपनों का प्यार,
और बचपन जैसी एक राहत हो।
छठ मइया का आना आज भी होता है,
बस वक़्त का अंदाज़ बदल गया है,
पहले घर में त्योहार उतरता था,
अब दिल में यादों का दीप जल गया है
— प्रभाकर शर्मा
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