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अँधेरे से संवाद

                
                                                         
                            अँधेरा, तुमने जीना सिखाया,
                                                                 
                            
तुमने शांत होना सिखाया।
जब दुनिया ने मुझसे बातें कीं,
तुमने मुझे मुझसे मिलाया।

तुम्हारी खामोशी में
मैंने अपने भीतर की आवाज़ सुनी,
जो दिन के शोर में
कहीं खो गई थी।

मैंने पूछा—
“तुम इतने गहरे क्यों हो?”
तुमने कहा—
“क्योंकि उजाला देखने से पहले
अपने भीतर उतरना पड़ता है।”

मैंने पूछा—
“तुम मुझे अकेला क्यों करते हो?”
तुम मुस्कुराए—
“ताकि जान सको,
अकेलापन और स्वयं के साथ होना
एक बात नहीं।”

तब समझा—
तुम कोई रात नहीं,
मेरे भीतर खुलता हुआ
एक मौन आकाश हो।

तुम्हारी गहराई में उतरकर जाना—
जिस प्रकाश को मैं
सारी उम्र बाहर खोजता रहा,
वह कहीं और था ही नहीं...

वह मेरे भीतर था,
बस उसे देखने के लिए
मुझे अँधेरे से होकर गुजरना था।
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एक घंटा पहले

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