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वह कभी कलश नहीं बन पाता है!

                
                                                         
                            सावन ही उमड़ घुमड़ के
                                                                 
                            
धरा पर बारिश बरसाता हैं।
सावन ही पोषण करता हैं,
तब बसंत में बहार आता हैं।।

हर घर में माता पिता
सावन की भूमिका निभाते हैं।
वे नई पीढ़ी के जीवन में,
हर कष्ट सहकर बहार लाते हैं।।

हमारे ग्रामीण अंचल
सावन की भूमिका निभाते हैं।
वें खेती में कष्ट करके,
नागरी जीवन में बहार लाते हैं।।

हमारे गरीब मजदूर
सावन की भूमिका निभाते हैं।
वें खून पसीना बहाकर,
श्रीमंतो के जीवन में बहार लाते हैं।।

हमारी लेखनी
सावन की भूमिका निभाती हैं।
अविश्रांत लेखन करके,
पोवारी भाषा में बहार लाती हैं।।

ऋतुओं में सावन ऋतु
अहम् भूमिका निभाता हैं।
फिर भी सब ऋतुओं में,
ऋतुराज बसंत ही कहलाता हैं।।

ऋतुओं का यही न्याय
हमारे जीवन में भी पाया जाता है।
जो निभाता सावन की भूमिका,
वो कभी कलश नहीं बन पाता है।।
-ओ सी पटले
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एक महीने पहले

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