मी बहुत प्रेम लक लिखूं।
मी बहुत विश्वास लक लिखूं।
मातृभाषा को वैभव बढ़ावन साती,
बसंत ऋतु को बहारों वानी सुंदर लिखूं।।
मी सदैव अद्वितीय लिखूं।
मी सदैव अविस्मरणीय लिखूं।
मातृभाषा को वैभव बढ़ावन साती,
बसंत ऋतु को बहारों वानी सुंदर लिखूं।।
समर्पण भाव लक लिखूं।
संवेदनशीलता मन लक लिखूं।
मातृभाषा को वैभव बढ़ावन साती,
बसंत ऋतु को बहारों वानी सुंदर लिखूं।।
मातृभाषा मा अकल्पनीय लिखूं।
मातृभाषा मा विलोभनीय लिखूं।
मातृभाषा को वैभव बढ़ावन साती,
बसंत ऋतु को बहारों वानी सुंदर लिखूं।।
कल्पनाशक्ति को बलपर लिखूं।
भाषा को सौंदर्य बढ़ावन लिखूं।
मातृभाषा को वैभव बढ़ावन साती,
बसंत ऋतु को बहारों वानी सुंदर लिखूं।।
मातृभाषा मा मनोहर लिखूं।
मातृभाषा मा मनभावन लिखूं।
मातृभाषा को वैभव बढ़ावन साती,
बसंत ऋतु को बहारों वानी सुंदर लिखूं।।
सागर वानी गहरी सोच लक लिखूं।
भाषा ला नवीं ऊंचाई देवावन लिखूं।
मातृभाषा को वैभव बढ़ावन साती,
बसंत ऋतु को बहारों वानी सुंदर लिखूं।।
बरसात की झड़ी वानी लगातार लिखूं।
चंद्र सूर्य की गति वानी निरंतर लिखूं।
मातृभाषा को वैभव बढ़ावन साती,
बसंत ऋतु को बहारों वानी सुंदर लिखूं।।
न केवल एक भाषा मानकर लिखूं।
समाज की आत्मा समझकर लिखूं।।
मातृभाषा को वैभव बढ़ावन साती,
बसंत ऋतु को बहारों वानी सुंदर लिखूं।।
-ओ सी पटले
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