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जीवंत चेतना

                
                                                         
                            दिल से निकल के सन्मार्ग की राहें
                                                                 
                            
जी मंजिल का पता ढूंढती है
जो दे एक सकारात्मक दृष्टिकोण
ऐसी विचारशील सरिता का प्रवाह ढूंढती है
दिशा भ्रम के फैले जाल में
पथ को भटकने से रोकना है
बड़ी ही लोलुपता की डगर है
स्वार्थ से सादगी गुमराह हो गई
विकराल है ऐसी ज्वलंत चिंगारी
जिसमें मानवता खो गई
आओ ढूंढें कुछ ऐसे मोती
जो धर्म की सार्थकता को ले के साथ चलें
जनहित परहित जैसे शब्दों के अर्थों का मान रखें
मेरे शब्दों की माला ऐसे ही
प्यारे फूलों का पता पूछती है
दिल से निकल के सन्मार्ग की राहें
जो मंजिल का पता ढूंढती है
-पूनम राठौर
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एक वर्ष पहले

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