सामने सूखा पेड़ खड़ा है,
मानो कोई संत खड़ा है।
पत्तों का श्रृंगार नहीं,
फिर भी प्रकृति का पहरेदार खड़ा है।
पतझड़ ने सब कुछ छीन लिया,
फिर भी चेहरे पर शिकवा नहीं,
मौन अधरों से जैसे कहता—
“जीवन में कोई ठहराव नहीं।”
धूप ने झुलसाया तन उसका,
आँधी ने भी खूब सताया है,
फिर भी धरती की गोद में उसने
अपना अस्तित्व बचाया है।
टूटी शाखाएँ हाथों जैसी,
आकाश की ओर उठी हुईं,
मानो ईश्वर से प्रार्थना करतीं—
“फिर से हरियाली दे दो।”
सामने सूखा पेड़ खड़ा है,
पर भीतर जीवन शेष पड़ा है;
आज भले ही नीरव है वह,
कल फिर पल्लवित होने का स्वप्न लिए खड़ा है l.....
-पूनम कुमारी
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