राम कहे जन्म सफल आजू।
भज जग नाथ छोड सब काजू।
राम न कछु वन गमन सकुचाई।
जनु चहत करही अति भलाई।
सीता सुनी राम वन ठाना।
व्याकुल भई गमन सुजाना।
अति विनीत पति चरण लागी ।
नाथ विनती करही अभागी।
नाम जपो गोविंद गोविंद।
महिमा अपार करे आबाद।
लखन राम प्रेम दूजा नाहि
शारदा कहीं सक न अघाहि
वृंदावन में बसत भगवान।
यहि मम मन बना वृंदावन
यहां कहां बबुल कछु कांटा।
प्रभु विचरत है बना सपाटा।
राम चरण ऊर रती लागी ।
भजहुं निरंतर प्रभू पद भागी।
प्रभु पद कमल अति सुखदाई।
सब संतन यह सत्य समुझाई।
तुलसी रचा रामचरितमानस।
राखिय ध्यान कलियुगी मानस।
प्रथम पद पंकज लागी गणपति ।
जिन्ह कृपा ऊर आवहि सुमति।
अस्थि पाहि कुकुर दौड़ जाई।
जसु राम भजन मोहि भाई।
हरि चरणन में शीश झुकाऊ।
हरि के दिव्य प्रेम गुण गांऊ।
हरि पद पंकज अति सुखदाई।
चरण पूजा मनो मन मुस्काई।
मानसिक पूजा करूं ध्यान।
प्रभु स्वीकारे सब कल्यान।
सब प्रकार नाप जप आधारा।
कछु नहीं साधन विस्तारा।
हनु हनु हनु हनुमंत मनाऊ।
राममिलन की आस लगाऊ।
हनुमंता से सुंदर नाता।
राम राम रटत गीत गाता।
ईश्वर ध्यान मंगलकारी।
राम राम रटत शुभ विचारी।
राम करत उद्धार तुम्हारा।
राम नाम बिन कछु न अपारा।
रघुपति चरण अति प्रीति लागी।
प्रभु स्मरण पूजन मन जागी।
जिमी केवट पर लगी दाया।
तिमी रघुपति मोही कृपाया ।
प्रभु जिमी शबरी कुटी जाई।
तस कृपा मोह पर रघुराई।
कर जोड विनती बारं-बार।
प्रभु कबहु आवही मम द्वार।
पुनि पुनि हनुमत कर परनामा।
प्रभु संदेश करहु गुनग्रामा।
हनुमत पाइ आशीष सीता।
अनुकूल भए सब विपरीता।
देख संसार सुमर भगवान ।
राम बिना कबहुं न कल्यान।
राम नाम मानहू संसार।
राम उतारहू तव भवसार।
राम देख ताड़का सुखाई।
मानहु जीव भयो सुखदाई ।
जानत राम भव तारणहार।
बहु जन्म जीव करत बलिहार।
जिमी तड़पत मीन बिन पानी।
तिमी जीव बिन भगवंत जानी।
जीव न कबहुं कहीं सुखाई।
बिन हरि जगत न नित्य भलाई।
गुरु गुरुत्व गुड राम बताइ।
बिन आज्ञा नहीं धनुष चढाइ।
आज्ञा लिन्ही पुर भ्रमण किन्हा ।
जनक पुरी वासिन सुख दिन्हा।।
धनुष तोड नृप गुर मर्दन किन्हा।
राम न कछु गुर तहां चिन्हा।।
सिता प्रसन्न न उमंग समाई।
वरमाला ले अति सकुचाई।
जो नर सियाराम संग देखी।
तिन्ह जान्हु भाग्य विलेखी।
नर नारिन नयन सुख पावा।
सुर दुर्लभ यह सब संतन गावा।
तुलसि कहि कुकवि भनिति सुहाई
तिन्ह राम सुयश बहु वर्णाई।।
बिन राम कहि काव्य बढ़ाई।
जिमि भुसन बिन नारि सुहाई।।
देवी देव कह श्री पुकारूं।
भगवंत दरश देहि उपकारू।।
चरण कमल की रज स्वीकारूं।
अति दुर्लभ कलियुगी संसारू।
विचरो वृंदावन विहारी दरश।
कोटी अरण्यों विहार स्पर्श।
हरि दरश की आश लगाहूं।
वृंदावन मह नित्य अवगाहूं
भजु श्रीहनुमत सब सुखदाई।
करहु कल्याण नहि सकुचाई।
भज हनु जो चाहत रघुराई।
राम मिल्ही हनुमत हर्षाई।
राम राखियो राख मोही।
दिन दिन दिन भयो राह जोही।
जगन्नाथ जग जाग कराई।
भज मोही नही जग भलाई।
फिरकत जग ढूंढे वेष्णाई।
मय तुमही कर नही ढिठाई।
मानव मन मंगलमुर्ति मानहू ।
प्रभू शरण एव मंगल जानहू।
सतत हरी स्मरण धयानहू।
नहीं गति तव कीर्तन गावहू।
तुलसिदास प्रथम प्रनव किन्हा।
बोधमय वाणी गणराया।
जिन्हीं कृपा रची सुसभीती।
राम रसिक अरु काव्य नीती।
राम राम महिमा जन गायी
प्रभू शरण राखियो अवगायी।
संतन सतत कहि हरी अपारा।
कलीयुग हरि नाम विसतारा।
प्रथम गणपति दुज गुरु गाया।
गूरु गुरुत्व बहु विधी जताया।
तुलसि गुरू महिमा बहु गाई।
शंकर रूपेण गुरू गिनाई।
जह तह अति कोलाहल पाऊ।
प्रभु स्मरण नहीं संसार गाऊ।
अपनी ढोल बजहि सब कोई।
सुर बेढोल राम भज नाई।
राम नयन भर देखी गंगा।
षष्ठ पूजन किय सीता संगा।
जनु पतित पावनि जग बताई।
पुजहु गंग अनुराग मन लाई।
धन्य केवट राम चरण लागी।
कहीं न जाय सरल बढ भागी।
अति प्रसन्न रामा अनुरागी।
चाहत राम तारहि अनुभागी।
निषाद कहि लेहु न उतराई।
जेहि मोहि भव पार कराई।
कुंभकार नापित नहि धराई।।
तिमी प्रभु मय मानहू भाई।
वर्षा दामिनी रुप राम देखूं।
दोउ प्रदायिनी जीव लेखू।
वृष्टि राम जीवन अति लागी।
षूष्ट करहू जीव अनुरागी।
नाना तरकऊ प्रभु रिझाई।
नहि तव बुद्धि राम समुझाई।
नहि ऋषि मुनि कबहुं पार पाई।
सतत संतन भग ध्यान लगाई।
करी बाल विविध चरित रामा।
मात पित बहू विधि अभिरामा ।
जेहि बालक रुप राम देखूं।
लेहूं अभिराम जीव विषेखू।
करहूं सियाराम पर नेहू।
कछु दूर्लभ नहीं कर संदेहू।
जस जस श्रीराम प्रेम बढ़ावा।
तासु सब सुगम नहि बिसरावा।
कलियुगी सुरपणखा बहुतेरे।
ढूंढत रामा लखन घेनेरे ।
तेही चरित कहीं अधिकाई।
जे देखी सुर्पनखा लजाई।
कहू आपहू अति बढभागी ।
कहीं तव दुस संगत नहि लागी।।
बनही बिगडही संगत पाई ।
यही सुसंगत महीमा गाई ।।
धन्य चित्रकुट जह राम बसई।
कह नहि जाय मंगलम सुखाई।
चित्रकुट तव मन नित्य बनाऊ।
जेहि चह राम प्रीति लगाऊ।
जह राम तह चित्रकुट जानहू।
यहि विधी तव मन फहचानहू।
राम बिन शरिरन नहीं राखा।
पुजहू निश दिन तव प्रभु साखा।
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