कल को बैठा था खाली हाथ
चहारदीवारी में
शाम की रोटी के बारे में सोचते हुए
दिन की तपा देने वाली
दीवारों पर चढ़ती धूप
अब धीरे-धीरे दीवारों से उतर रही थी
और समय अपनी मद्धम चाल में आंगन से गुजर रहा था।
जेब में बची हुई साख को
खामोशी से टटोल रहा था मैं
कहीं धूल में दबकर
आखिरी सांस न गिन रही हो।
चूल्हा चुप था
बर्तनों में भी कोई खनक ना थी
बस कहीं से कुलबुलाहट की आवाज
हर सन्नाटे में सुनाई देती थी।
खिड़की से आती हुई हवा
उस सन्नाटे को भी
कहीं दूर बहा ले जाती प्रतीत होती थी
मगर मेरी उलझनें वहीं ठहरी रहती थीं।
सामने एक सड़क थी
और शहर अपनी रफ्तार पकड़ रहा था
मेरे घर अंधेरा
वक्त से पहले ही पहुँच रहा था।
हिसाब लगाता रहा दिन भर की मेहनत का
हिसाब लगाते-लगाते
प्रत्येक बार घाटा ही हाथ लगा
कुछ न कुछ कमी हर बार रह गई।
सोचा फिर मेहनत करने वालों का हाल
मेहनत करने के बाद भी
शाम की रोटी का इंतजार
और महलों की वो मेजें
जिन पर रोटियां ठंडी पड़ी रह गईं।
फिर याद आया मुझे मार्क्स का
मजदूरी से अलगाव का विचार
कैसे मजदूर करता है मजदूरी
बनाता है महल और फिर
महल पर रहता नहीं उनका ही कोई हक।
खाली हाथ बैठे हुए भी
मन खाली ना था
उसमें सवाल थे -
रोटी जैसे बड़े तो नहीं
मगर रोटी जितने जरूरी
जरूर थे।
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