मैं मुसाफिर पर नहीं अपनी ख़ुशी का मुंतज़िर हूँ
सिर्फ अपनों के ही होंठों की हँसी का मुंतज़िर हूँ
एक झलक से उसकी नजरों को मिले चैन-ओ-सुकूँ भी
मैं सनम की दीद की ही रौशनी का मुंतज़िर हूँ
ज़िंदगी में हमको चाहत भी नहीं है देवों की अब
मैं तो सच्चे और सीधे आदमी का मुंतज़िर हूँ
वो कभी भी अब न लौटेंगे ये है मालूम मुझको
आज भी हूँ आस में और मैं उसी का मुंतज़िर हूँ
हर मुसाफ़िर मुंतज़िर होता किसी का तो हमेशा
मैं मोहब्बत से भरी उस ज़िंदगी का मुंतज़िर हूँ
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