घोंसला फिर से सजाएँगे मोहब्बत से
भरोसे की जड़ों को फिर बनाएँगे मोहब्बत से
फिसल जाता है पल में वक़्त जाने कैसे मुट्ठी से
गुज़िश्ता वक़्त को लौटा ही लाएँगे मोहब्बत से
जहाँ बर्तन दो होते हैं खटक ही जाते हैं अक्सर
खताएँ बख़्श दिल को फिर मिलाएँगे मोहब्बत से
तू रूठे तो मना लूँगी मैं, मुझको तुम मना लेना
गले इक बार फिर से लग ही जाएँगे मोहब्बत से
समझ से काम लें तो प्यार क़ायम ही रहे 'पारुल'
अमर इस प्यार को करके दिखाएँगे मोहब्बत से
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