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मेरी तक़दीर में

                
                                                         
                            दिल में मेरे हो, नहीं हो तुम मेरी तक़दीर में
                                                                 
                            
दिल को बहलाती हूँ, तुमको देखकर तस्वीर में

चुपके सिरहाने मेरे, यादों को रख जाते हो तुम
ढूँढती रहती हूँ तुमको, ख़्वाबों की ताबीर में

मैं तख़य्युल में तिरे रहती हूँ, खोई-खोई सी
कैद कर रक्खा, ख़यालों की तू ने ज़ंज़ीर में

क़ातिब-ए-तक़दीर को मंज़ूर था, कुछ और ही
साथ भी अपना, लिखा उसने नहीं तहरीर में

सिर्फ अब अफसोस है 'पारुल' मुकद्दर में मेरे
ज़िंदगी सारी ही गुज़री, वस्ल की तदबीर में
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3 महीने पहले

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