कभी वक़्त ज़िंदगी में मेरा साज़गार होता
यूँ ही कोई भी कभी तो मेरा ग़म-गुसार होता
ग़म-ए-दिल मेरा झुलसता रहा है यूँ उम्र भर ही
हमें कोई इक शजर मिलता जो साया-दार होता
यूँ भटक गए मोहब्बत की ही आरज़ू में हम तो
नहीं बद-नसीब लोगों से किसी को प्यार होता
कहा जाता भी नहीं दर्द किसी से अपने दिल का
नहीं ख़त्म वक़्त-ए-रुख़सत भी ये इंतिज़ार होता
किसी गुल पे तो लिखा होता हमारा नाम 'पारुल'
नहीं गुल सही, तो किस्मत में हमारी ख़ार होता
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