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ख़ुद से मिलन

                
                                                         
                            भीड़ बाहर की तू अब छोड़ के, अंदर को चल
                                                                 
                            
मन की अनजान सी राहों में, बसे घर को चल

मारी-मारी तू कहाँ फिर रही ग़ाफिल होकर
ख़ुद को है ढूँढना, तो मन के समुंदर को चल

आसाँ होता नहीं ख़ुद से ही मिलन जीवन में
अपने हृदय के कलश में, है जो मंदर को चल

दिल में मूरत सजी प्रभू की, जहां में मत ढूँढ
प्रेम परमात्म छुपा, मन के तू अंबर को चल

झाँक कर देख तू भीतर, वहीं सब कुछ 'पारुल'
ख़ुद को पहचानने को, दिल के दिगंबर को चल
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3 महीने पहले

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