क़दम जब धूप में जलते हैं बढ़ रफ़्तार जाती है
हो मन में ज़िद तो मंज़िल तेरी हो तय्यार जाती है
कहानी को मुकम्मल करना भी आसाँ नहीं होता
न मानी हार तो राहों की ढह दीवार जाती है
किसी दिन तेरी रुसवाई न बन जाए ये कमज़ोरी
ये कमज़ोरी ही इस दुनिया में बन अख़बार जाती है
ख़फ़ा होना नहीं अपनी कभी नाकामी पर ख़ुद से
ये नाकामी भी इक दिन तेरी बन दस्तार जाती है
यूँ गिर-उठ कर ही मक़सद अपना मिलता आया है सबको
उसी की ज़िंदगी फिर होती ख़ुद-मुख़्तार जाती है
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