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जब से सच को बोला है

                
                                                         
                            भुगत रहे हैं क्या कहें के जब से सच को बोला है
                                                                 
                            
न घर के हैं न घाट के जो हमने मुँह को खोला है

न समझा पाए प्रेम का तो असली रूप हम उन्हें
मेरा ये मन तो उनके पाक प्रेम में ही डोला है

ज़र-ओ-ज़मीं न देखी और न देखा गाड़ी बंगला
है प्यार को भी प्यार के तराजू पर ही तोला है

ख़ता न होती होगी किससे इस ज़माने में यहाँ
मगर कभी भी रिश्तों में जहर नहीं यूँ घोला है

यहाँ पे किसने क्या है चाहा जान पाया कोई नहीं
सुना नहीं किसी ने, सच का ढोल भी तो पोला है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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