दरारे दोस्ती में हों तो दुआ, बद्दुआ लगती
भलाई की भी हर कोशिश उसे मेरी सज़ा लगती
मैं अपने हिस्से के सुख नाम उसके कर दूँ सच मानो
मगर उसको मैं शायद ज़िंदगी की इक ख़ता लगती
हमेशा उसके ग़म में रो पड़ी हैं मेरी भी आँखें
न जाने क्यूँ उसे फ़ितरत ही मेरी बे-वफ़ा लगती
नहीं मुझको शिकायत उससे क़िस्मत का लिखा है ये
अंधेरा ही दिखा मुझमें उसे, कैसे ज़िया लगती
दुखया तो नहीं मैंने कभी दिल जानकर उसका
अगर दिल से हो अपना कहता तो उसको दवा लगती
कभी तो उसको सच एहसास होगा बाद मेरे ही
मुझे पहचान पाता जीते जी तो दिलरुबा लगती
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