ख़ुद को तू इस दर्द की लज़्ज़त से मत महरूम कर
क्या हुई तुझसे ख़ता ख़ुद ही तू अब मालूम कर
टूट कर ख़ुद को कभी तुम यूँ बिखरने देना मत
हार दिल की बाज़ी तू ख़ुद को नहीं मग़्मूम कर
जो कुशलता भी न पूछे, उसके खातिर रोना क्यूँ
ज़िंदगी उसके लिए अपनी नहीं मादूम कर
ज़ख़्म सारे भर ही जाएँगे तेरे भी देखना
घर से निकला कर तू चौखट उस ख़ुदा की चूम कर
मत लिया कर बातें अपने दिल पे पारुल यूँ कभी
मतलबी दुनिया है जब तो ख़ुद को मत मासूम कर
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